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अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
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भीष्म उवाच
पर्वतान्रम्यसानूंश्च नलिनीश्च सपङ्कजाः |  ३   क
चित्रशालाश्च विविधास्तोरणानि च भारत |  ३   ख
शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम् ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति