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वन पर्व
अध्याय ११
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्योधनः स्मितं कृत्वा चरणेनालिखन्महीम् |  २९   क
न किञ्चिदुक्त्वा दुर्मेधास्तस्थौ किञ्चिदवाङ्मुखः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति