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वन पर्व
अध्याय ११३
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विभाण्डक उवाच
न तानि सेवेत मुनिर्यतात्मा; सतां लोकान्प्रार्थय़ानः कथञ्चित् |  ३   क
कृत्वा विघ्नं तापसानां रमन्ते; पापाचारास्तपसस्तान्यपाप ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति