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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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अर्जुन उवाच
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा; भय़ेन च प्रव्यथितं मनो मे |  ४५   क
तदेव मे दर्शय़ देव रूपं; प्रसीद देवेश जगन्निवास ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति