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विराट पर्व
अध्याय ११
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विराट उवाच
इदं तवेष्टं यदि वै सुरोपम; व्रवीहि यत्ते प्रसमीक्षितं वसु |  १०   क
न तेऽनुरूपं हय़कर्म विद्यते; प्रभासि राजेव हि संमतो मम ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति