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विराट पर्व
अध्याय ११
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विराट उवाच
युधिष्ठिरस्येव हि दर्शनेन मे; समं तवेदं प्रिय़दर्श दर्शनम् |  ११   क
कथं तु भृत्यैः स विनाकृतो वने; वसत्यनिन्द्यो रमते च पाण्डवः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति