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विराट पर्व
अध्याय ११
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं हि मत्स्ये न्यवसन्त पाण्डवा; यथाप्रतिज्ञाभिरमोघदर्शनाः |  १३   क
अज्ञातचर्यां व्यचरन्समाहिताः; समुद्रनेमीपतय़ोऽतिदुःखिताः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति