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विराट पर्व
अध्याय ११
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वैशम्पाय़न उवाच
स वै हय़ानैक्षत तांस्ततस्ततः; समीक्षमाणं च ददर्श मत्स्यराट् |  २   क
ततोऽव्रवीत्ताननुगानमित्रहा; कुतोऽय़माय़ाति नरोऽमरप्रभः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति