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विराट पर्व
अध्याय ११
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वैशम्पाय़न उवाच
अभ्येत्य राजानममित्रहाव्रवी; ज्जय़ोऽस्तु ते पार्थिव भद्रमस्तु च |  ४   क
हय़ेषु युक्तो नृप संमतः सदा; तवाश्वसूतो निपुणो भवाम्यहम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति