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विराट पर्व
अध्याय ११
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विराट उवाच
यदस्ति किञ्चिन्मम वाजिवाहनं; तदस्तु सर्वं त्वदधीनमद्य वै |  ९   क
ये चापि केचिन्मम वाजिय़ोजका; स्त्वदाश्रय़ाः सारथय़श्च सन्तु मे ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति