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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
गङ्गाह्रदश्च तत्रैव कूपश्च भरतर्षभ |  १५३   क
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां तस्मिन्कूपे महीपते |  १५३   ख
तत्र स्नात्वा नरो राजन्स्वर्गलोकं प्रपद्यते ||  १५३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति