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भीष्म पर्व
अध्याय ९४
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सञ्जय़ उवाच
उद्वृत्य चक्षुषी कोपान्निर्दहन्निव भारत |  ३   क
सदेवासुरगन्धर्वं लोकं लोकविदां वरः |  ३   ख
अव्रवीत्तव पुत्रं तु सामपूर्वमिदं वचः ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति