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वन पर्व
अध्याय ८५
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वैशम्पाय़न उवाच
अगस्त्यस्य च राजेन्द्र तत्राश्रमवरो महान् |  १५   क
हिरण्यविन्दुः कथितो गिरौ कालञ्जरे नृप ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति