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कर्ण पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
चरित्वा विविधान्मार्गान्मण्डलं स्थानमेव च |  २०   क
शरैः पूर्णाय़तोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति