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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य च तदा भीष्मं शिरोभिः प्रतिपेदिरे |  ५४   क
पूजय़न्तो महाराज पाण्डवा भरतर्षभ |  ५४   ख
प्रणम्य शिरसा चैनं भीष्मं शरणमन्वय़ुः ||  ५४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति