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कर्ण पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
ललाटस्थं ततो वाणं धारय़ामास पाण्डवः |  ६   क
यथा शृङ्गं वने दृप्तः खड्गो धारय़ते नृप ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति