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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
स्वमंशमवशिष्टं स संस्मृत्य शकुनिं नृप |  ४४   क
रथेन काञ्चनाङ्गेन सहदेवः समभ्ययात् |  ४४   ख
अधिज्यं वलवत्कृत्वा व्याक्षिपन्सुमहद्धनुः ||  ४४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति