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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
स्मरामि तानि सर्वाणि वाल्ये वृत्तानि यानि नौ |  २५   क
तानि सर्वाणि जीर्णानि साम्प्रतं नौ रणाजिरे |  २५   ख
किमन्यत्क्रोधलोभाभ्यां युध्यामि त्वाद्य सात्वत ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति