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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा तु यान्तं पुरुषप्रवीरं; भीष्मः शरैरभ्यहनत्तरस्वी |  १७   क
स चापि भीष्मस्य हय़ान्निहत्य; विव्याध पार्श्वे दशभिः पृषत्कैः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति