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विराट पर्व
अध्याय २१
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वैशम्पाय़न उवाच
दर्पाच्च सूतपुत्रोऽसौ गन्धर्वानवमन्यते |  २८   क
तं त्वं प्रहरतां श्रेष्ठ नडं नाग इवोद्धर ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति