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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
तावकानामनीकेषु पाण्डवा जितकाशिनः |  ३३   क
व्यचरन्त महाराज प्रेक्षणीय़ाः समन्ततः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति