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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
व्रह्मलोकपरा भूत्वा प्रार्थय़न्तो जय़ं युधि |  ४३   क
सुय़ुद्धेन पराक्रान्ता नराः स्वर्गमभीप्सवः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति