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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
हत विध्यत गृह्णीत प्रहरध्वं निकृन्तत |  ४६   क
इति स्म वाचः श्रूय़न्ते तव तेषां च वै वले ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति