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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
धर्मराजोऽपि सङ्क्रुद्धो मद्रराजं महाय़शाः |  ५१   क
विव्याध निशितैर्वाणैः कङ्कवर्हिणवाजितैः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति