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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
चन्द्रसेनं च सप्तत्या सूतं च नवभिः शरैः |  ५२   क
द्रुमसेनं चतुःषष्ट्या निजघान महारथः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति