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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
चक्ररक्षे हते शल्यः पाण्डवेन महात्मना |  ५३   क
निजघान ततो राजंश्चेदीन्वै पञ्चविंशतिम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति