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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
ध्वजं निपतितं दृष्ट्वा पाण्डवं च व्यवस्थितम् |  ५८   क
सङ्क्रुद्धो मद्रराजोऽभूच्छरवर्षं मुमोच ह ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति