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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
तस्य शल्यो रणे क्रुद्धो वाणैः संनतपर्वभिः |  ६२   क
दिशः प्रच्छादय़ामास प्रदिशश्च महारथः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति