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शान्ति पर्व
अध्याय २३
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वैशम्पाय़न उवाच
गृहस्थं हि सदा देवाः पितर ऋषय़स्तथा |  ४   क
भृत्याश्चैवोपजीवन्ति तान्भजस्व महीपते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति