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द्रोण पर्व
अध्याय ६१
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धृतराष्ट्र उवाच
राज्यकामस्य मूढस्य रागोपहतचेतसः |  ५१   क
दुर्नीतं वा सुनीतं वा तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति