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आदि पर्व
अध्याय ११०
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पाण्डुरु उवाच
न चाप्यवहसन्कञ्चिन्न कुर्वन्भ्रुकुटीं क्वचित् |  १०   क
प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति