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वन पर्व
अध्याय २१५
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मार्कण्डेय़ उवाच
स तानुवाच व्यथितो वालोऽय़ं सुमहावलः |  १५   क
स्रष्टारमपि लोकानां युधि विक्रम्य नाशय़ेत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति