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शान्ति पर्व
अध्याय १९५
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मनुरु उवाच
इमे शरीरैर्जलमेव गत्वा; जलाच्च तेजः पवनोऽन्तरिक्षम् |  २   क
खाद्वै निवर्तन्ति नभाविनस्ते; ये भाविनस्ते परमाप्नुवन्ति ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति