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आदि पर्व
अध्याय ११०
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्थं कामं सुखं चैव रतिं च परमात्मिकाम् |  ३८   क
प्रतस्थे सर्वमुत्सृज्य सभार्यः कुरुपुङ्गवः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति