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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीद्धर्मराजो ह्रिय़माणो युधिष्ठिरः |  ८   क
धर्मस्ते हीय़ते मूढ न चैनं समवेक्षसे ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति