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उद्योग पर्व
अध्याय १८५
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भीष्म उवाच
ततो रात्र्यां व्यतीताय़ां प्रतिवुद्धोऽस्मि भारत |  १   क
तं च सञ्चिन्त्य वै स्वप्नमवापं हर्षमुत्तमम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति