वन पर्व  अध्याय १६४

अर्जुन उवाच

मघवानपि देवेशो रथमारुह्य सुप्रभम् |  १९   क
उवाच भगवान्वाक्यं स्मय़न्निव सुरारिहा ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति