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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
ऊर्ध्वं दृष्टिर्वाहवश्च एकाग्रं च मनोऽभवत् |  ४१   क
एकपादस्थिताः सम्यक्काष्ठभूताः समाहिताः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति