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अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
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भीष्म उवाच
दरिद्रैर्मनुजैः पार्थ प्राप्यं यज्ञफलं यथा |  १३५   क
उपवासमिमं कृत्वा गच्छेच्च परमां गतिम् |  १३५   ख
देवद्विजातिपूजाय़ां रतो भरतसत्तम ||  १३५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति