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अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
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भीष्म उवाच
सदा त्रिषवणस्नाय़ी व्रह्मचार्यनसूय़कः |  २४   क
गवामय़स्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति