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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
शकुनिं दशभिर्विद्ध्वा चतुर्भिश्चास्य वाजिनः |  ५२   क
छत्रं ध्वजं धनुश्चास्य छित्त्वा सिंह इवानदत् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति