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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
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वासुदेव उवाच
तस्मै सम्प्रतिपन्नाय़ यथावत्परिपृच्छते |  १०   क
शिष्याय़ गुणय़ुक्ताय़ शान्ताय़ गुरुवर्तिने |  १०   ख
छाय़ाभूताय़ दान्ताय़ यतय़े व्रह्मचारिणे ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति