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अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
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भीष्म उवाच
तत्र कल्पसहस्रं स कान्ताभिः सह मोदते |  ८०   क
सुधारसं च भुञ्जीत अमृतोपममुत्तमम् ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति