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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
यथा वनान्ते वनपैर्विसृष्टः; कक्षं दहेत्कृष्णगतिः सघोषः |  ६१   क
भूरिद्रुमं शुष्कलतावितानं; भृशं समृद्धो ज्वलनः प्रतापी ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति