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अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
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भीष्म उवाच
लोकमौशनसं दिव्यं शक्रलोकं च गच्छति |  ८८   क
अश्विनोर्मरुतां चैव सुखेष्वभिरतः सदा ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति