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वन पर्व
अध्याय ११०
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लोमश उवाच
तस्यर्श्यशृङ्गं शिरसि राजन्नासीन्महात्मनः |  १७   क
तेनर्श्यशृङ्ग इत्येवं तदा स प्रथितोऽभवत् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति