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वन पर्व
अध्याय ११०
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लोमश उवाच
आश्रमश्चैव पुण्याख्यः काश्यपस्य महात्मनः |  २   क
ऋश्यशृङ्गः सुतो यस्य तपस्वी संय़तेन्द्रिय़ः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति