वन पर्व  अध्याय ११०

लोमश उवाच

ततोऽङ्गपतिराहूय़ सचिवान्मन्त्रकोविदान् |  २८   क
ऋश्यशृङ्गागमे यत्नमकरोन्मन्त्रनिश्चय़े ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति