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उद्योग पर्व
अध्याय ११०
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गालव उवाच
नैव मेऽस्ति धनं किञ्चिन्न धनेनान्वितः सुहृत् |  १८   क
न चार्थेनापि महता शक्यमेतद्व्यपोहितुम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति