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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
मार्कण्डेय़स्य राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् |  ७०   क
गोमतीगङ्गय़ोश्चैव सङ्गमे लोकविश्रुते |  ७०   ख
अग्निष्टोममवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ||  ७०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति