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आदि पर्व
अध्याय १८१
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वैशम्पाय़न उवाच
महत्यथापराह्णे तु घनैः सूर्य इवावृतः |  ४०   क
व्राह्मणैः प्राविशत्तत्र जिष्णुर्व्रह्मपुरस्कृतः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति